पेड़..! (संदेश प्रतियोगिता के लिये)
पेड़...!!
"इस पेड़ का जो ये तना है ना... वो मुझे कुछ अजीब सा लग रहा है, तुझे नहीं लग रहा क्या..?"
"लग रहा है ना, लेकिन उसका क्या...?"
"यार... तेरी समझ में नहीं आ रहा.. मुझे क्या कहना है..!"
"ए चल बे तू... पकाऊ... तुझे तो आदत ही लगी है किसी शोधकर्ता जैसे खोजने की, पहलेसेही इधर बोअर हुआ हूँ, दिनरात इन पथ्थरों की पढाई कर के। वो 'रॉक सायकल' और वो 'बोवेन रिएक्शन सीरीज' करके दिमाग ख़राब हुआ है। किधर घूमने निकले तो तेरी इधर पेड़ की पढाई शुरू होगई।"
"अरे सुन तो, पढाई के बारें में नहीं कह रहा मैं, अजीब मतलब ध्यान से देख पेड़ का तना ना होकर किसी आदमी का चेहरा दिखाई दे रहा है।"
"ए राहुल तू चल ना यहाँ से, हम उधर दूसरे रास्ते से जाते है।" संतोष, राहुल को खिंच कर दूसरी ओर लेकर गया। मन में उसके भी डर था। उस पेड़ का विशाल तना सचमुच एक क्रोधी व्यक्ति के चेहरे जैसा लग रहा था, लेकिन अगर उसने यह बात मान ली होती तो राहुल रोज यहां आकर देखता और प्रयोग करता। 'जिऑलॉजी' के अध्ययन के साथ-साथ उसका पसंदीदा विषय "वैश्विक ऊर्जा और उसके प्रयोग" था। पूरे ब्रह्मांड में केवल एक ही ऊर्जा है और वही ऊर्जा हम में भी है और साथ ही सभी जीवित चीजों और अचल चीजों में भी खेल रही है, इसलिए अपनी मानसिक शक्ति से हम जहां चाहें वहां ऊर्जा को जाग्रत कर उनसे संवाद कर सकते है, उनसे कनेक्ट हो सकते है, ऐसा उसका दृढ़ विश्वास था, प्रतिदिन मेडिटेशन करने से वह कुछ हद तक एकाग्र होने लगा था, इसके अलावा उसने पतंजलि योग जैसी कई किताबें पढ़कर अपने ज्ञान में इजाफा किया था। हालाँकि, अभीतक एक भी वास्तविक प्रयोग सफल नहीं रहा। लेकिन राहुल अपनी आस्था पर अडिग था, इसलिए हाल ही में उनका इस विषय पर खूब मजाक भी उड़ाया जा रहा था। हॉस्टेल पर लौटने के बाद भी राहुल का मन उस पेड़ के तने के प्रश्न से त्रस्त था। कुछ दिनों बाद परीक्षा की उलझन के कारण वह पेड़ के बारे में भूल गया, परीक्षा हुई, कॉलेज में दिवाली की छुट्टियां होने लगीं और सभी छात्र घर जाने की तैयारी करने लगे।
"यार... जब तुम सब चले जाओगे तो मैं अकेला क्या करूँगा? बहुत बोरियत होगी यार..” संतोष की मां द्वारा दी गई चकली को चाय में डुबोकर और खाकर राहुल ने मासूमियत से कहा।
"बेटे, क्या चकली चाय में डुबोने वाली चीज है..?" उसको एक चपत लगाकर अपना सामान फटाफट बैग में पैक कर रहा था उतने में संतोष राहुल के प्रश्न से रुक गया।
"तु ऐसा क्यों नहीं करता राहुल, तू भी मेरे साथ हमारे गांव चल। बदलाव के लिए, तुझे हमारा गांव जरूर पसंद आएगा। साथ ही, तुझे 'मेडिटेशन' और ‘कॉस्मिक एनर्जी रिसर्च' करने के लिए पर्याप्त स्थान भी मिलेगा, चल।"
एक पल सोचने के बाद, राहुल तैयार हो गया, उन दोनों को अपनाअपना सामन पैक करके निकलते निकलते रात हो गई, कुछ बच्चे और वे दोनों अपने सामान के साथ स्टॉप पर बस के आने की प्रतीक्षा में बातें कर रहे थे, थोड़ी देर बाद बस आई लेकिन वह बस संतोष के गांव की नहीं थी। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी बच्चे चले गए, केवल संतोष और राहुल ही रह गए, उनकी बस आने में अभी भी एक और घंटा बाकी था, उनके पास समय था, फिर उन्होंने पास के ही ढाबा में खाना खाने का फैसला किया। ढाबे पर तौबा गर्दी थी कैसे तो कर के उनको जगह मिली। खाना खाते खाते उनको बोहोत देर हो चुकी थी। जब तक वो बाहर आते तबतक उनकी बस निकल चुकी थी। खुद को गाली देते हुए वो सामन के साथ वापस हॉस्टेल को रवाना हुए। वापस जाते समय राहुल ने एक बार फिर पेड़ को देखा। वह चकित था, इतने अंधेरे में भी वह उस पेड़ को स्पष्ट रूप से देख सकता था! जैसे ही उसने संतोष को दिखाया, तो संतोष को गुस्सा आ गया। शायद बस छूटने की वजह से वह गुस्से में था। लेकिन राहुल ने संतोष से अभी इस बारे में बात नहीं करने का फैसला किया। अगली सुबह वे दोनों जल्दी निकल गए, लेकिन आज भी महाबळेश्वर से कोई बस नहीं आई। घाट में भूस्खलन के कारण बस के आने के रास्ते को बंद कर दिया गया था। प्रतीक्षा करने के बाद, वे हॉस्टेल वापस लौट आए। बेशक, वो पेड़ वापस दिखाई दिया, लेकिन इसबार राहुल ने चालाकी दिखाई, उसने इस विषय के बारें में संतोष के साथ कोई बातचीत नहीं की।
हालाँकि, जब वह वापस आया, तो उसने अपने मन में एक निर्णय लिया, "संतोष, तु जा! मेरी वजह से तू क्यूँ परेशान हो रहा है।"
"कुछ भी बक़वास मत कर, एक प्राकृतिक आपदा क्या कर सकते है।"
"नहीं, मुझे लगता है कि यह एक संकेत होना चाहिए कि मुझे तुम्हारे साथ नहीं जाना चाहिए," राहुल ने शुन्य में देखते हुए कहा।
"हाँ? ... सच में?, और संकेत कौन दे रहा है? तुम्हारा वो छपरी पेड़?"
"यार, तू छपरी क्यों कहता है..? किसी के बारें में ऐसा अपशब्द नहीं निकलना चाहिए, किसमें क्या होगा, किसका वहाँपर वास होगा पता नहीं..?"
"तू बकवास मत कर राहुल, वह पेड़ जो एक जगह खंबे की तरह खड़ा है, वह एक इंच भी नहीं हिल सकता और वह टूट रहा है, क्यों? क्यूंकि तू मेरे साथ ना जाए इसलिए..? भग... रुक अभी जाकर एक लात मारकर आता हूँ तब तेरे सर से ये भुत हटेगा।" संतोष भागते हुए उस पेड़ की तरफ़ गया। राहुल उसको पीछे से आवाज देकर रोकने की कोशिश करने लगा, लेकिन तबतक देर हो चुकी थी। संतोष वापस आया और उसने कहा।
"मैं अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा हूं, मैंने उस पेड़ को एक जबरदस्त लात मारी, साले मैं तेरे सिर से भ्रम को दूर करने की कोशिश कर रहा था, लात मारने की वजह से अभीतक मेरे पैर झनझना रहे है।" हँसते हुए संतोष ने कहा।
राहुलने कुछ नहीं कहा। दोपहर के भोजन के बाद उन दोनों ने निर्णय लिया कि मोटरसाइकिल से बस स्टॉप तक जाएंगे, उधर से जो भी बस मिलेगी वो बस पकड़कर आगे जाएंगे और वापस आने तक मोटरसाइकिल पास के ही गैरेजवाले के पास छोड़ देंगे। अब संतोष भी बोहोत खुश नजर आ रहा था। भोजन कर के दोनों लोग मोटरसाइकिल पर सवार होकर निकल गए। स्टॉप के पास आनेपर पता चलता है कि गैरेज बंद था। संतोष खीज सा गया उतने में सामने से एक जीप आकर उनके सामने रुक गई।
"किधर जाना है..!" अंदर से लाल पिचकारी मारते हुए ड्राइव्हर ने पूछा।
"कुछ नहीं भैया... महाबलेश्वर तक जाना है और उधर से कोई भी बस मिलने के बाद गांव के अंदर, लेकिन लगता है योग नहीं आ रहा है। आप किधर से आ रहे हो..!"
"आगे कोनसे गांव जानेवाले हो..?"
"देवली गांव.."
"तो मेरे साथ चलो मैं भी उधर ही जा रहा हूँ। बोहोत दूर का रास्ता मैं भी अकेले जा रहा हूँ, तुम दोनों की कंपनी तो मिलेगी मुझे..!"
"लेकिन भैया आप इधर गलत दिशा में किधर जा रहे थे। रास्ता तो आपके पीछे है..?" संतोष ने आश्चर्य जताते हुए कहा।
"अरे इधर एक काम है वो पूरा होने के बाद आगे चलेंगे, आओ बैठो जल्दी चलो। बस आधाएक घंटे का काम है।"
ड्राइव्हर का मुहँ पान खाने की वजह से लाल हुआ था, लेकिन शक्ल से जेंटलमैन लग रहा था। दोनो भी तैयार हुए। लेकिन गैरेज बंद होने के कारण मोटरसाइकिल वापस होस्टेल छोड़कर और ड्राइव्हर हमे वहीं से पिक कर लेगा ये डिसाईड होने पर दोनों होस्टल की तरफ़ चल दिये। संतोष तो और खुश नजर आ रहा था, क्योंकि अब तो सीधा गांव के अंदर जानेवाली गाड़ी मिल गयी थी। रास्तेपर वापस वो पेड़ दिखाई देने पर संतोष ने उसे अपना मुहँ टेढ़ा कर के चिढ़ाया और उतने में क्या हुआ पता नहीं चला संतोष की मोटरसाइकिल धड़ाम से पेड़ के उस तने से जा टकराई, पीछे रिव्हर्स जाकर वापस गोल घूमकर फ़िरसे उस पेड़ से टकराई। संतोष फुटबॉल की तरह उछल गया और ये सब राहुलने देखा और वो बेहोश हो गया..!!!
किसी के चिल्लाने की वज़ह से राहुलने अपनी आँखें खोल ली, एक पल लगा उसे ये बात समझने में की इस वक़्त वो कहा है। उसी समय उसका ध्यान ऊपर की तरफ़ गया, ऊपर खोपड़ी का ऊपरी आधा भाग एक शाखा पर लटका हुआ था और .... और सामने का दूसरा आधा भाग उसके नीचे पूरी बत्तीसी दिखाकर चिढ़ाने वाले अंदाज में लटका हुआ था। वो चेहरा संतोष का था। वो डरावना दृश्य देखकर राहुल वापस बेहोश हो गया।
"संतोष ये क्या कर बैठा यार तू..? तुझे कहा था मैंने, वॉर्न किया था, नहीं पता उन बातों से मत उलझो, पर तुने सुना नहीं, इसलिए जान गवानी पड़ी। मुझे अकेला छोड़कर चला गया।" अस्पताल की बिस्तर पर लेटे लेटे राहुल जोरजोर से रो रहा था। आज पूरे चार दिन हुए थे उसके आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उस भीषण एक्सीडेंट के बाद राहुल जो बेहोश हुआ वो सीधा अस्पताल में होश में आया। गांव लोगों ने ही उसको अस्पताल में भर्ती करवाया था। संतोष का अजीब-सा लटका हुआ चेहरा और उसके नीचे का शरीर एकसाथ जोड़ने में सभी लोगों को काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी। पोलिस लोगों को भी हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी बॉडी को हात लगाने में।
गांव से संतोष की माँ को भी बुला लिया गया। उनका करुण रुदन देख, सभी की आँखें पनिया गई। ग्रामीणों ने इसके बारे में बात करने से परहेज किया, यह महसूस करते हुए कि उनके इकलौते बच्चे के शरीर को देखने के लिए उसे वो बात बर्दाश्त नहीं होगी। सभी क्रियाक्रम कर के और थोड़ा सा इलाज करा कर अपना पूरा सामान लेकर राहुल वापस होस्टल लौट आया।
अनाथ राहुल एक प्रतिष्ठित परिवार द्वारा दी जाने वाली स्कोलरशीप पर 'जिओलॉजी' में ग्रेज्युएशन कर रहा था। वह और संतोष हॉस्टल में मिले, अपने रूममेट से सबसे अच्छे दोस्त बन गए। कितनी बार उन दोनों ने एक साथ युवा आशा के सपनों को रंगा था, अब जब अंतिम वर्ष की परीक्षाएं ख़त्म हो जाने के बाद, तो वे एक साथ आगे की योजना बनानेवाले थे। यह अजीब हादसा तब हुआ जब सब कुछ ठीक चल रहा था और नियति को दोष देकर सभी लोग अपनेअपने घर गये। लेकिन दुर्घटनास्थल पर एकत्र हुए सभी लोगों को आश्चर्य हुआ कि राहुल को साधारण खरोच तक नहीं आयी। हादसे के चार दिन बाद रोज की तरह पेड़ के बगल से लोगों का आना-जाना शुरू हो गया। कोई अफवाह नहीं थी कि वो जगह संक्रमित है, इसलिए आश्चर्य अभी भी कायम था, लेकिन सब दिनचर्या फिर से शुरू हो गई।
राहुल वापस होस्टल आ चुका था। राहुल और एक नोकर के परिवार छोड़कर पूरे होस्टल में सन्नाटा छाया हुआ था। कम से कम पंद्रह दिन तक कोई आनेवाला नहीं था, अब राहुल ने अपनी कॉस्मिक एनर्जी के साथ प्रयोग करने का फैसला किया। सुबह जल्दी उठकर अपनी प्रातःकाल विधि निपटा कर अच्छे से नहाकर वो साधना करने के लिए उस पेड़ के सामने बैठ गया।
'मुझे तेरे साथ बात करनी है..!" उसने उस पेड़ को संदेश भेजा। उसके बाद राहुल दिनरात उस पेड़ को संदेश भेजता रहा ऐसे ही दिन बीतते गये और एक रात को उसको सोते समय किसी ने तो हिलाया।
'सोने दे यार संतोष... क्या साली मगजमारी है..' राहुल ने अपनी नींद में कहा और अगले ही पल जाग गया, यह महसूस करते हुए कि वो तो कमरे में अकेला हैं और संतोष अब इस दुनिया में नहीं है। वो तुरंत बेड़पर उठकर बैठ गया, सभी जगह एक प्रकार की गंध फैली हुई थी, उस गंध से उसको उल्टी जैसा होने लगा था, उतने में उसके सामने से गर्जना हुई।
"बोल..ss"
राहुलने अपनी आँखें मलमलकर सामने की ओर देखा। अंधेरें में उसे दिखाई दिया, सामने अर्धनग्न अवस्था में एक एक असाधारण ऊँची मानवी आकृति खड़ी है। हात में त्रिशूल, और पूरे शरीर पर रुद्राक्ष की माला, अंधेरें में चमकने वाली भयानक आँखें, उसका सिर ऊपर छत को छू रहा था।
"कको...कौन..?" राहुलने माथेपर आया हुआ पसीना पोछते हुये पूछा।
"क्यूँ बुलाया..?" उसकी भयानक आवाज से राहुल का डर के मारे बुरा हाल था। राहुल को इतनी काली रात में भी उसकी आँखों में अंगार दिखाई दीया। "बोल क्यूँ दिन रात मुझे संदेश देकर बुला रहा था..?"
"मsमैंने... नहीं तो..! आपको... नहीं..!" राहुल को लगा कि वो कुछ ज्यादा ही हकला रहा है इसलिए वो चुप बैठ गया।
"मैं उसी पेड़ से आया हूँ जिस पर तुम दिन-रात संदेश भेज रहे थे। मुझे बताओ कि तु क्या कहना चाहता है।" यह सुनकर, उसे यह सोचकर राहत मिली कि वो उसकी इच्छा के विरुद्ध इस राक्षसी शक्ति को यहाँ आने के लिए मजबूर कर सकता हैं और इस बात से राहुल जरा सावधान हुआ।
अपने सूखे होठों पर अपनी जीभ घुमाते हुए उसने पूछा, "लेकिन क्या आप उस पेड़ में रहते थे? कभी दिखा नहीं तू मेरा मतलब तुम?" राहुल डर के मारे कभी आप कभी तू ऐसे बोलकर सी-सॉ खेल रहा था।
"मैं वहाँ शारीरिक रूप से नहीं रहता, मूर्ख, तुम्हारे पास इंद्रियों की सीमा है, ह
हमारे पास नहीं।" ये बाउंसर था राहुल के लिए। लेकिन राहुल को याद आया कि कहीं तो उसने पढ़ा था कि साधु या फ़िर अघोरी अथवा मांत्रिक ऐसे पत्थरों या फ़िर पेड़ों में अदृश्य रुप में साधना करते है, इसके पेहराव से ये अघोर साधना करनेवाला लग रहा था, ऐसा राहुल को लगा।
"मेरा प्यारा दोस्त, संतोष, मैं तुमसे पूछना चाहता था कि तुमने उसे इतने अजीब तरीके से क्यों मारा..? उसने आपका अपमान किया, लेकिन बस इतना ही? तुमने तो उसका अस्तित्व ही नष्ट कर दिया? इतने घिनौने तरीके से? इतनी सी गलती का इतनी भयानक सजा..!" राहुल की आँखों के सामने वो भयंकर मंजर तैर गया।
"गलतियाँ और सजा इसकी शुरुवात तुम करते हो हम नहीं। शुरुवात उसने की और खत्म मैंने। अगर उसने मुझे चिढ़ाया नहीं होता तो वो बच सकता था..!"
"फिर तो मैंने भी तुझे संदेश भेज कर उकसाया है, तो फिर आप मुझे भी...." राहुल का चेहरा पिला पड़ गया।
"तुम मुझे नहीं, मैं तुम्हें संदेश कर रहा था, इसलिए मैं तुम्हारे गांव जाने का रास्ता रोक रहा था। अगर यह तुम्हारा बेवकूफ दोस्त नहीं होता, तो अबतक मेरा काम खत्म हो जाता होता," वो बरस पड़ा।
"म..मेरे पास क्या काम..?" राहुल को अपना आवाज एकदम ऐसे हकलाहट भरा क्यों लग रहा था पता नहीं।
"मेरी साधना के लिये मुझे एक शरीर चाहिए था, जो तेरा है।"
"नहीं.. मैं कैसे आप के काम आ सकता हूँ..?" (मैं देखो कितना बटला हूँ और आप कितने ऊँचे कदकाठी के हो) ये शब्द उसने सिर्फ इशारे से कहे थे क्यूँकि उसके बोल ही नहीं फुट रहे थे।
"साधना के लिए ऊँचा नीचा नहीं देखा जाता, सिर्फ मन का मिलना जरूरी होता है, मूर्ख.. अगर तुझे तेरी हालात अपने दोस्त जैसी देखनी नहीं है तो कल अमावस है, बराबर रात के बारह बजे उधर आ जाना।"
"उधर मतलब किधर..?" राहुल की सांसें उखड़ने लगी थी।
"उधर ही उस पेड़ के पास..!" इतना कहकर वो अघोर वहाँ से गायब हो गया। राहुल की नींद पूरी तरह से गायब हो चुकी थी। पूरी रात वो सोया नहीं। उसे पता चल चुका था कि वो अब भाग नहीं सकता। वो अगर पाताल में भी गया तो वो अगजोर उसे ढूंढ निकलेगा और अपना काम कर लेगा। उसको उधर रात के समय जाने के सिवाय कुछ चारा नहीं था।
रातकीडों की आवाज कितनी भयानक होती है, राहुल पेड़ के नज़दीक पहुँच गया था। बारह बजने वाले थे। थोड़ी देर बाद उसमें से 'घूम-घुम' की आवाज आने लगी, 'मंत्रोच्चारण' शुरू हो चुका था। राहुल का डर के मारे बुरा हाल था। सामने लाल कपड़े में बंधा एक यंत्र था, उसकी अभी पूजा की गयी थी ऐसा प्रतीत हो रहा था।
"बैठो," अंदर से एक कर्कश आवाज आई। किसी ने उसके सिर को छुआ और उसने ऊपर देखा, एक हाथ उसके सिर पर था, और उसने डर के मारे अपनी आँखें मुँद ली, "ॐ, ऐ ह्री , श्रीम , अं , सत्ये , हं शवले , ह्सखफ्रे , खरवे , क्लिं रामे , ह्सखफ्रे, नारद ऋषी: , गायत्री छन्द: , श्री गुरू देवता , गुं बीज , ह्री शक्ती: परकाया प्रवेश.."
आगे का सुनने के लिए राहुल होश में ही नहीं था।
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पी..पी.., मोटरसाइकिल सवार कॉलेज के दो युवकों को आगे जाने के लिये वाणी ने रास्ता दिया। एक युवक उसे घूरे जा रहा था और आगे जाकर उसने दूसरे से कहा, "देखा क्या... क्या मस्त आयटम थी..!"
"नहीं यार... मेरा तो सारा ध्यान उस पेड़ के तने पर ही था। अजीबसा लग रहा है।" मोटरसाइकिल पर बैठा दूसरा युवक उस पेड़ को ही सम्मोहित होकर देख रहा था और उस पेड़ के अंदर से राहुल उस युवक को देख रहा था।
समाप्त
#लेखनी
Niraj Pandey
02-Nov-2021 04:11 PM
बहुत ही बेहतरीन
Reply
pk123
02-Nov-2021 04:12 PM
Thanks
Reply
Manish Kumar(DEV)
02-Nov-2021 10:41 AM
Awesome
Reply
pk123
02-Nov-2021 01:21 PM
Thanks
Reply
🤫
02-Nov-2021 08:42 AM
बेहतरीन रचना..👌
Reply
pk123
02-Nov-2021 09:37 AM
धन्यवाद
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